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भारत के खिलाफ आक्रामक होते इस्लामिक देशों के सुर, पहला नहीं है नुपूर शर्मा का मामला

2022 June/06 PRJ न्यूज़ ब्यूरो

इस्लामिक देश भारत को लेकर अब आक्रामक रुख अपनाने लगे हैं। नुपूर शर्मा और नवीन कुमार जिंदल के पैगंबर मोहम्मद पर दिए कथित बयान को लेकर जिस प्रकार कतर ने वहां भारतीय राजदूत को तलब किया। साथ ही मामले में भारत सरकार से माफी मांगने को कहा, वह उसके कड़े रुख को दर्शाता है। हालांकि, जब यह सब हो रहा था, उससे पहले ही विवादित बयान देने के लिए जिम्मेदार लोगों पर भाजपा ने कार्रवाई कर दी थी।

दरअसल, धार्मिक मामले बेहद संवेदनशील होते हैं। गैर सरकारी लोगों को भी ऐसे मामलों में बयान देते समय सावधानी बरतने की जरूरत है। इसमें संदेह नहीं है। कतर में स्थित भारतीय दूतावास ने इस मामले में वहां की सरकार के समक्ष दो टूक कहा कि यह टिप्पणी भारत सरकार का बयान नहीं है, न ही सरकार ऐसे किसी बयान का कभी समर्थन करती है। बल्कि यह बाहरी तत्वों का बयान है। जिनके खिलाफ पहले ही कार्रवाई हो चुकी है।

भारत सभी धर्मों व संस्कृति का सम्मान करता है। धार्मिक एवं सांस्कृतिक विविधता में विश्वास करता है। इसके बाद भी कतर का भारत सरकार से माफी की मांग करना अनुचित प्रतीत होता है। सूत्रों की मानें तो मुस्लिम राष्ट्रों का रुख भारत के प्रति पिछले कुछ समय से ज्यादा तल्ख है। जबकि कई बार बिना किसी वजह से वह भारत के अंदरूनी मामलों में दखल देते हैं। जैसे, जम्मू-कश्मीर में परिसीमन की कार्रवाई पर ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक को-ऑपरेशन ने चिंता जता दी। उसे इस बात पर आपत्ति थी कि भारत चुनावी सीटों की सीमाओं में बदलाव कर रहा है।

ओआईसी ने इस वर्ष इस्लामाबाद में विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस को आमंत्रित कर डाला, जिसका तुक नहीं है। दोनों मामलों में भारत को सख्त रुख अपनाकर ओआईसी को फटकार लगानी पड़ी। पर संगठन के इतर भी कई देश जब भी मौका मिलता है तो भारत के खिलाफ बयान देते रहते है। उधर, ईरान और कुवैत ने भी पैगंबर मोहम्मद पर की गई टिप्पणी मामले पर भारत के सामने विरोध जताया है।

किसी देश के निजी मामले को उठाना गलत
पूर्व में मुस्लिमों पर हमले को लेकर भी ओआईसी और कई देश टिप्पणी करते रहे हैं, जबकि भारत इनके निजी मामलों पर टिप्पणी नहीं करता है। विदेश मामलों के जानकारों का कहना है ऐसे मामलों को किसी देश द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का औचित्य नहीं है, क्योंकि एसे मामले कई देशों में होते रहते हैं व उन्हें सरकार का समर्थन नहीं होता है।

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