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MITHILA- BIHAR : GI Tag से पंजीकृत हुआ मिथिला मखाना

जानिए कैसे और किसे मिलता है यह सम्मान

2022 अगस्त 22/ PRJ न्यूज ब्यूरो, बिहार:
GI Tag से पंजीकृत हुआ मिथिला मखाना

बिहार के मिथिला (Mithila) में एक कहावत मशहूर है- पग-पग पोखरि, माछ-मखान। केंद्र सरकार (Central Government) ने मिथिला के मखाना को जियोग्राफिकल इंडिकेशन टैग (Geographical Indication Tag) दे दिया है। इससे मखाना उत्पादकों को अब उनके उत्पाद का और भी बेहतर दाम मिल पाएगा। मिथिला के मखाने अपने स्वाद, पोषक तत्व और प्राकृतिक रूप से उगाए जाने के लिए प्रख्यात है। भारत के 90% मखानों का उत्पादन यहीं से होता है। इससे पहले बिहार की मधुबनी पेंटिंग, कतरनी चावल, मगही पान, सिलाव का खाजा, मुजफ्फरपुर की शाही लीची और भागलपुर के जरदालू आम को जीआई टैग दिया जा चुका है।

इसकी जानकारी देते हुए केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल (Union Minister Piyush Goyal) ने कहा, ‘जीआई टैग से पंजीकृत हुआ मिथिला का मखाना, किसानों को मिलेगा लाभ और आसान होगा कमाना। त्योहारी सीजन में मिथिला मखाना को जीआई टैग मिलने से बिहार के बाहर भी लोग श्रद्धा भाव से इस शुभ सामग्री का उपयोग कर पाएंगे।’ आमतौर पर उपवास में इस्तेमाल होने वाले मखाने हेल्दी स्नैकिंग का हिस्सा रहे हैं। यह ऐसी फसल है, जिसे पानी में उगाया जाता है। मखाने में करीब 9.7 ग्राम प्रोटीन और 14.5 ग्राम फाइबर होता है। यह कैल्शियम का बहुत अच्छा स्रोत है।
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1999 में बना कानून
संसद ने उत्पाद के रजिस्ट्रीकरण और संरक्षण को लेकर दिसंबर 1999 में अधिनियम पारित किया। जिसे अंग्रेजी में Geographical Indications of Goods (Registration and Protection) Act, 1999 कहा गया। इसे 2003 में लागू किया गया। इसके तहत भारत में पाए जाने वाले प्रॉडक्ट के लिए जी आई टैग देने का सिलसिला शुरू हुआ।क्या है जीआई टैग
वर्ल्‍ड इंटलैक्‍चुअल प्रॉपर्टी ऑर्गेनाइजेशन (WIPO) के मुताबिक जियोग्राफिकल इंडिकेशंस टैग एक प्रकार का लेबल होता है जिसमें किसी प्रॉडक्‍ट को विशेष भौगोलि‍क पहचान दी जाती है। ऐसा प्रॉडक्‍ट जिसकी विशेषता या फिर प्रतिष्‍ठा मुख्‍य रूप से प्राकृति और मानवीय कारकों पर निर्भर करती है। भारत में संसद की तरफ से सन् 1999 में रजिस्ट्रेशन एंड प्रोटेक्शन एक्ट के तहत ‘जियोग्राफिकल इंडिकेशंस ऑफ गुड्स’ लागू किया था। इस आधार पर भारत के किसी भी क्षेत्र में पाए जाने वाली विशिष्ट वस्तु का कानूनी अधिकार उस राज्य को दे दिया जाता है। ये टैग किसी खास भौगोलिक परिस्थिति में पाई जाने वाली या फिर तैयार की जाने वाली वस्तुओं के दूसरे स्थानों पर गैर-कानूनी प्रयोग को रोकना है।

किन उत्पादों को दिया जाता है GI Tag
इसमें पहला है, खेती से जुड़े उत्पाद। इसका अर्थ है कि किसी खास क्षेत्र में जो चीजें पैदा होती हैं, उसे यह टैग मिल जाता है। जैसे उत्तराखंड का तेजपात, बासमती चावल, दार्जिलिंग टी, भागलपुर का जरदालु आम। हैंडीक्राफ्ट्स के क्षेत्र में भी जीआई टैग दिया जाता है। जैसे कि जैसे बनारस की साड़ी, चंदेरी साड़ी, महाराष्ट्र सोलापुर का चद्दर, कर्नाटक का मैसूर सिल्क। तमिलनाडु का कांजीवरम सिल्क। इसके अलावा खाद्य सामग्री को भी यह टैग दिया जाता है। जैसे आंध्र प्रदेश में तिरुपति का लड्डू, राजस्थान की बीकानेरी भुजिया, तेलंगाना के हैदराबाद की हलीम, पश्चिम बंगाल का रसोगुल्ला, मध्य प्रदेश का कड़कनाथ मुर्गा आदि।
कैसे मिलता है GI टैग
किसी प्रॉडक्ट के लिए GI Tag हासिल करने के लिए आवेदन करना पड़ता है। इसके लिए वहां उस उत्पाद को बनाने वाली जाे एसोसिएशन होती है वो अप्लाई कर सकती है। इसके अलावा कोई कलेक्टिव बॉडी अप्लाई कर सकती है। सरकारी स्तर पर भी आवेदन किया जा सकता है। जीआई टैग अप्लाई करने वालों को यह बताना होगा कि उन्हें टैग क्यों दिया जाए। सिर्फ बताना नहीं पड़ेगा, प्रूफ भी देना होगा। प्रॉडक्ट की यूनिकनेस के बारे में उसके ऐतिहासिक विरासत के बारे में। क्यों सेम प्रोडक्ट पर कोई दूसरा दावा करता है तो आप कैसे मौलिक हैं यह साबित करना होगा। जिसके बाद संस्था साक्ष्यों और सबंधित तर्कों का परीक्षण करती हैं, मानकों पर खरा उतरने वाले को जीआई टैग मिलता है। जीआई टैग से पहले किसी भी सामान की गुणवत्ता, उसकी क्‍वालिटी और पैदावार की अच्छे से जांच की जाती है। यह तय किया जाता है कि उस खास वस्तु की सबसे अधिक और ओरिजिनल पैदावार निर्धारित राज्य की ही है। इसके साथ ही यह भी तय किए जाना जरूरी होता है कि भौगोलिक स्थिति का उसके उत्‍पादन में कितना योगदान है। कई बार किसी खास वस्तु का उत्‍पादन एक विशेष स्थान पर ही संभव हो पाता है। इसके लिए वहां की जलवायु से लेकर उसे आखिरी स्वरूप देने वाले कारीगरों तक का बहुत योगदान होता है।
कौन देता है GI टैग
भारत में वाणिज्‍य मंत्रालय (Commerce Ministry) के तहत आने वाले डिपार्टमेंट ऑफ इंडस्‍ट्री प्रमोशन एंड इंटरनल ट्रेड (DIPIT) की तरफ से जीआई टैग दिया जाता है। भारत में ये टैग किसी खास फसल, प्राकृतिक और मैन्‍युफैक्‍चर्ड प्रॉडक्‍ट्स को दिया जाता है। कई बार ऐसा भी होता है कि एक से अधिक राज्यों में बराबर रूप से पाई जाने वाली फसल या किसी प्राकृतिक वस्तु को उन सभी राज्यों का मिला-जुला GI टैग दिया जाता है। उदाहरण के लिए बासमती चावल जिस पर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों का अधिकार है।
कितनी वस्‍तुओं को मिला टैग
जीआई टैग को हासिल करने के लिए सबसे पहले चेन्नई स्थित जीआई डेटाबेस में अप्लाई करना पड़ता है। इसके अधिकार व्यक्तियों, उत्पादकों और संस्थाओं को दिए जा सकते हैं। एक बार रजिस्ट्री हो जाने के बाद 10 सालों तक यह ये टैग मान्य होते हैं, जिसके बाद इन्हें फिर रिन्यू करवाना पड़ता है। देश में पहला जीआई टैग साल 2004 में दार्जिलिंग चाय को मिला था। अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर WIPO की तरफ से जीआई टैग जारी किया जाता है। इस टैग वाली वस्‍तुओं पर कोई और देश अपना दावा नहीं ठोक सकता है।

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